
मुंबई, 12 सितंबर 2025 — भारतीय पूँजी बाजारों के नियामक, SEBI (Securities and Exchange Board of India) ने शुक्रवार को बड़े कॉरपोरेट IPOs (Initial Public Offerings) को सहज बनाने के लिए कुछ अहम बदलावों को मंजूरी दे दी है। ये बदलाव प्रमुख रूप से उन कंपनियों को केंद्र में रखते हैं जिनका बाजार पूँजीकरण विशाल है और उन्हें सार्वजनिक निवेशकों के लिए हिस्सेदारी (dilution) की वर्तमान आवश्यकताओं के कारण IPO प्रक्रिया में चुनौतियाँ आती हैं।
प्रमुख बदलाव क्या हैं?
1. न्यूनतम हिस्सा जो कंपनी को बेचनी होगी—कम हुआ 5% से 2.5% तक
SEBI ने तय किया है कि यदि किसी कंपनी का पोस्ट‑लिस्टिंग मार्केट कैप ₹5 लाख करोड़ से अधिक है, तो वह IPO के ज़रिए अपनी पेड‑अप शेयर पूँजी का सिर्फ 2.5% बेच सकती है। इससे पहले यह न्यूनतम हिस्सा 5% था।
2. MPS (Minimum Public Shareholding) पूरा करने की अवधि बढ़ी
सार्वजनिक हिस्सेदारी के नियमों को पूरा करने का समय भी बढ़ाया गया है। कंपनियों को 25% सार्वजनिक हिस्सेदारी बनाने के लिए 5 वर्ष का समय मिलेगा, जबकि बड़ी कंपनियों (मार्केट कैप ₹1 लाख करोड़ से अधिक) के लिए यह अवधि 10 वर्ष हो सकती है।
3. विभिन्न मार्केट‑कैप श्रेणियों के लिए अलग-अलग IPO आकार और हिस्सेदारी तय
SEBI ने विभिन्न श्रेणियों के लिए न्यूनतम IPO आकार और हिस्सेदारी‑बिक्री के लिए स्केल‑आधारित दरें तय की हैं।
क्यों ये बदलाव ज़रूरी थे?
– हिस्सेदारी की भारी‑भरकम बिक्री से बचाव: जब बड़ी कंपनियों को IPO के समय पब्लिक को ज्यादा हिस्सेदारी देना होता है, तो शेयर की आपूर्ति बहुत बड़ी हो जाती है।
– IPO करने की बाधाएँ कम करना: कई बड़ी कंपनियां IPO से बच रही थीं क्योंकि उन्हें ज्यादा हिस्सेदारी बेचनी पड़ती थी।
– पूंजी बाजार में अधिक गतिविधि बढ़ाना: ये सुधार निवेशकों और फर्मों दोनों को सकारात्मक संकेत देते हैं।
संभावित प्रभाव और चुनौतियाँ
+ सकारात्मक पहलू:
– बड़ी कंपनियों को IPO के लिए हतोत्साहित नहीं किया जाएगा।
– पब्लिक float समय बढ़ने से कंपनियों को रणनीति बनाने का समय मिलेगा।
– विदेशी निवेशकों के लिए मार्केट अधिक आकर्षक होगा।
− चुनौतियाँ:
– IPO में कम हिस्सेदारी देने से लिक्विडिटी घट सकती है।
– निवेशकों को लग सकता है कि कंपनी नियंत्रण अपने पास ही रखना चाहती है।
– लंबी अवधि में परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, जिससे MPS पूरा करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
अन्य सुधार
SEBI ने विदेशी निवेशकों के लिए प्रक्रिया सरल बनाने, एंकर निवेशकों के लिए हिस्सेदारी बढ़ाने और REITs/InvITs के लिए नियम सुधार जैसे कदम भी उठाए हैं।
निष्कर्ष
SEBI का यह निर्णय बड़े IPOs की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। न्यूनतम हिस्सेदारी घटाने और सार्वजनिक शेयर होल्डिंग पूरा करने का समय बढ़ाने से, बड़ी कंपनियों को IPO के लिए प्रोत्साहन मिलेगा और बाजार में नई सूचीकरण गतिविधि बढ़ सकती है। निवेशकों को हालांकि सावधानी रखनी होगी क्योंकि हिस्सेदारी कम होने से पारदर्शिता और लिक्विडिटी पर असर हो सकता है।